असली समस्या विचारों की कमी है, न कि मतभेद: ‘मराठा स्वतंत्रता संग्राम’ पुस्तक के विमोचन पर नितिन गडकरी

Published Date: 26-06-2025

नितिन गडकरी ने ‘मराठा वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस’ पुस्तक का किया विमोचन

नई दिल्ली, 24 जून: केंद्रीय मंत्री श्री नितिन गडकरी ने आज नई दिल्ली में एक विशेष समारोह में शोधकर्ता और लेखक अभास वर्मा द्वारा लिखित नई पुस्तक मराठा वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस का विमोचन किया। यह पुस्तक भारतीय इतिहास के एक महत्वपूर्ण लेकिन उपेक्षित अध्याय को उजागर करती है—जिसमें छत्रपति संभाजी महाराज के बलिदान के बाद मुगलों के खिलाफ मराठा प्रतिरोध का वर्णन है।

यह पुस्तक इस भूले-बिसरे कालखंड को सैन्य दृढ़ता, प्रशासनिक निरंतरता और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के दृष्टिकोण से पुनर्निर्मित करती है—और इसे भारत का पहला संगठित स्वतंत्रता संग्राम बताया गया है।

इस अवसर पर श्री नितिन गडकरी ने कहा, “छत्रपति शिवाजी महाराज एक दूरदर्शी नेता थे, जिन्होंने हिंदवी स्वराज्य की नींव रखी—जो न्याय, समानता और सांस्कृतिक गर्व पर आधारित शासन का मॉडल था। वे सच्चे अर्थों में धर्मनिरपेक्ष थे, सभी धर्मों का सम्मान करते थे और कभी किसी के साथ अन्याय नहीं किया। दुर्भाग्य से ब्रिटिश इतिहासकारों ने चुनिंदा दस्तावेज़ीकरण और डायरी लेखन के माध्यम से हमारे इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा। आज असली चुनौती विचारों का संघर्ष नहीं, बल्कि विचारों की अनुपस्थिति है। हमें नई पीढ़ी को सच्चा, तथ्यों पर आधारित इतिहास प्रस्तुत करना चाहिए ताकि एक सशक्त और आत्मजागरूक भारत का निर्माण हो सके।”

इस कार्यक्रम में लेखक और इतिहासकार श्री उदय माहूरकर, ऑर्गनाइज़र साप्ताहिक के संपादक श्री प्रफुल्ल केतकर, गरुड़ प्रकाशन के संस्थापक श्री संक्रांत सानू और लेखक अभास वर्मा प्रमुख रूप से उपस्थित रहे। प्रख्यात विद्वान पद्मश्री प्रो. भरत गुप्त ने भी कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई।

श्री उदय माहूरकर ने कहा: “यह संग्राम भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम कहलाने योग्य है क्योंकि यह औरंगज़ेब की मृत्यु (1707) के साथ मुगल साम्राज्य के अंतिम विघटन की प्रक्रिया की शुरुआत करता है और मराठा साम्राज्य की नींव रखता है, जिसमें मराठाओं ने लगभग 50 वर्षों तक दिल्ली के मुगल सिंहासन को नियंत्रित किया।

यह पुस्तक भारत के दो महान योद्धाओं—संताजी घोरपड़े और धनाजी जाधव—को जीवंत करती है, जिन्होंने अपने पराक्रम से मुगलों को झकझोर दिया और औरंगज़ेब को भी भयभीत किया, लेकिन जिनके नाम आज के भारत को ज्ञात नहीं हैं।

साथ ही, लेखक अभास वर्मा ने भारत के इतिहास के एक उज्ज्वल लेकिन अज्ञात अध्याय को देश के सामने लाकर एक प्रशंसनीय कार्य किया है, जो लगभग तीन शताब्दियों तक महाराष्ट्र में दबा रहा।”

गरुड़ प्रकाशन के संस्थापक संक्रांत सानू ने कहा, “गरुड़ प्रकाशन की स्थापना इसीलिए की गई थी ताकि भारतीय दृष्टिकोण से अपनी कहानियों को प्रस्तुत किया जा सके। अनुभवी लेखकों से लेकर नए सितारों तक, गरुड़ ने ‘Uraban Naxals’ (विवेक अग्निहोत्री) और ‘All Religions Are Not the Same’ (संजय दीक्षित) जैसी बेस्टसेलर किताबें प्रकाशित की हैं। अभास वर्मा की यह पुस्तक भारत के इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय की नई व्याख्या प्रस्तुत करती है।”

यह पुस्तक 1689 से 1707 के बीच मराठा प्रतिरोध का एक सुसंगत विवरण प्रस्तुत करती है। यह राजाराम भोंसले के जिंजी किले तक के पलायन, किले की रक्षा, और संताजी और धनाजी द्वारा चलाए गए छापामार अभियानों को वर्णित करती है। साथ ही इसमें प्रशासनिक रणनीतियों, नागरिक नेतृत्व और नायक तथा बेरड़ जैसे स्थानीय समूहों के योगदान को भी रेखांकित किया गया है।

ऐतिहासिक ग्रंथों, मुगल दरबारी समाचारों और क्षेत्रीय अभिलेखों से प्राप्त जानकारी के आधार पर, पुस्तक डोड्डेरी (1696) और वागिंघेरा (1706–07) की लड़ाइयों, मुगल साम्राज्य के आंतरिक पतन, और ताराबाई के नेतृत्व में हुए सांस्कृतिक पुनरुत्थान को प्रस्तुत करती है। यह मराठा आंदोलन को केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं, बल्कि विदेशी शासन के खिलाफ भारत के पहले संगठित और रणनीतिक प्रतिरोध के रूप में प्रस्तुत करती है—जो बाद के स्वतंत्रता आंदोलनों का आधार बना।

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