दिसंबर 2025 में ₹1.74 लाख करोड़ का वस्तु एवं सेवा कर (GST) संग्रह एक असहज सच्चाई की ओर इशारा करता है — केंद्र सरकार की राजकोषीय गुंजाइश लगातार सिमट रही है। नवंबर के ₹1.7 लाख करोड़ के मुकाबले मामूली बढ़ोतरी अपेक्षित थी। दिसंबर के आंकड़े नवंबर की आर्थिक गतिविधियों को दर्शाते हैं, जब जीएसटी दरों में कटौती लागू हुए अभी केवल दूसरा महीना था। यह उम्मीद कि अप्रत्यक्ष करों में कमी से उपभोग में तुरंत तेज़ी आएगी और राजस्व बढ़ेगा, अब अव्यावहारिक प्रतीत होती है।
व्यवहार में, परिवार कर राहत पर सतर्क प्रतिक्रिया देते हैं। अतिरिक्त उपलब्ध आय अक्सर खर्च बढ़ाने से पहले बचत या कर्ज चुकाने में लगाई जाती है। यह रुझान बजट 2025 में आयकर ढांचे में बदलाव के बाद साफ़ दिखा, जब ₹12 लाख तक की आय को प्रभावी रूप से कर-मुक्त कर दिया गया। जीएसटी कटौती और आयकर राहत — दोनों ही सिद्धांततः सही और राजनीतिक रूप से आकर्षक कदम थे, लेकिन अल्पकाल में इन्होंने सार्वजनिक वित्त को प्रोत्साहित करने के बजाय उस पर दबाव डाला है।
आंकड़े इसकी पुष्टि करते हैं। नवंबर के अंत तक कुल कर राजस्व ₹13.9 लाख करोड़ रहा, जो साल-दर-साल आधार पर 3.4 प्रतिशत कम है। इसके विपरीत, अप्रैल-नवंबर अवधि में पूंजीगत व्यय बढ़कर ₹6.58 लाख करोड़ हो गया—पिछले वर्ष की तुलना में 28 प्रतिशत की तेज़ वृद्धि। वहीं, राजस्व व्यय में वृद्धि केवल 2.1 प्रतिशत रही। लेकिन यहां और कटौती की गुंजाइश सीमित है, क्योंकि वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान जैसे खर्चों में लचीलापन कम होता है।
नए राजस्व उपाय — जैसे तंबाकू पर ऊंची जीएसटी व उत्पाद शुल्क दरें और पान मसाला पर नए उपकर — फरवरी से लागू होंगे और उनका वास्तविक लाभ अगले वित्त वर्ष में दिखेगा। इसी बीच, लगातार कम थोक मुद्रास्फीति (औसतन -0.08 प्रतिशत) नाममात्र जीडीपी को नीचे खींच रही है, जिससे राजकोषीय घाटे और ऋण-जीडीपी अनुपात स्वतः ही पहले के अनुमान से अधिक दिखाई देंगे।
पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने सराहनीय राजकोषीय अनुशासन दिखाया है। लेकिन अब उसके सामने एक कठिन विकल्प है — विकासोन्मुख पूंजीगत खर्च में कटौती करे या फिर राजकोषीय लक्ष्यों से चूक का जोखिम उठाए। दोनों ही विकल्प दर्दरहित नहीं हैं, और समय तेज़ी से निकलता जा रहा है।


