भारत की दलहन नीति खाद्य सुरक्षा, किसान कल्याण और व्यापार कूटनीति के असहज संगम पर खड़ी है। वर्षों से सरकार दलहनों की संरचनात्मक कमी को आयात, मूल्य स्थिरीकरण और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर सीमित खरीद के मिश्रण से संभालती रही है। इनमें आयात सबसे अधिक राजनीतिक रूप से संवेदनशील है। नई दिल्ली का एक निर्णय आपूर्ति कड़ी होने पर खुदरा कीमतों को ठंडा कर सकता है, लेकिन वही फैसला खेत-स्तर की कीमतों को गिरा भी सकता है और किसानों को जोखिम में छोड़ सकता है।
इसीलिए अमेरिका के साथ किसी व्यापार समझौते के तहत भारत को अमेरिकी दलहन खरीदने की बाध्यता पड़ने की खबरों ने तीखी प्रतिक्रिया पैदा की। 2020-21 के कृषि कानून आंदोलनों के बाद से किसानों के हितों से समझौते का कोई भी संकेत विस्फोटक साबित हो सकता है। दलहन कोई हाशिये की फसल नहीं है। उत्पादन लगभग 2.5 करोड़ टन के आसपास रहा है, जबकि मांग करीब तीन करोड़ टन है, जिसे आयात से पूरा किया जाता है। दलहन गैर-अनाज प्रोटीन सेवन का लगभग एक-चौथाई हिस्सा उपलब्ध कराते हैं और करीब पाँच करोड़ किसानों व उनके परिवारों की आजीविका से जुड़े हैं।
फिर भी, दलहन उत्पादकों को वह भरोसा नहीं मिलता जो धान और गेहूं के किसानों को मिलता है। मूल्य समर्थन योजना के तहत खरीद हाल के वर्षों में उत्पादन के 2.9% से 12.4% के बीच ही रही है। कई राज्यों में खरीद केंद्र कम हैं, जिससे किसानों को निजी व्यापारियों को एमएसपी से नीचे बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है। वर्षा-आश्रित खेती, कम उत्पादकता और कमजोर बाजार समर्थन निवेश को हतोत्साहित करते हैं। नतीजा—कम उत्पादकता और आयात पर निर्भरता का दुष्चक्र।
₹11,440 करोड़ के परिव्यय और 2030-31 तक महत्वाकांक्षी उत्पादन लक्ष्यों के साथ सरकार का नया आत्मनिर्भरता मिशन इस दुष्चक्र को तोड़ने की कोशिश करता है। लेकिन किसान आशंकित हैं। अमेरिकी दलहनों के लिए बाजार और खोलना कीमतों को दबाएगा और मिशन के घोषित उद्देश्यों के विपरीत जाएगा।
यदि भारत दलहनों में आत्मनिर्भरता को लेकर गंभीर है, तो उसे व्यापार की बाहरी छवि से आगे देखना होगा। खरीद व्यवस्था को मजबूत करना, व्यवहार में एमएसपी की गारंटी देना, वर्षा-आश्रित क्षेत्रों की उत्पादकता में निवेश करना और दलहन खेती को प्रोत्साहित करना अनिवार्य है। ऐसे संरचनात्मक सुधारों के बिना भारत आयात पर निर्भर बना रहेगा—और हर व्यापार वार्ता देश के भीतर राजनीतिक जोखिम लेकर आएगी।


