बज़्म-ए-शमीम ज़मीरी सरधन्वी द्वारा काव्य गोष्ठी का हुआ आयोजन

Published Date: 07-12-2025

नई दिल्ली। विशुद्ध साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था “बज़्म-ए-शमीम ज़मीरी सरधन्वी” द्वारा आयोजित बर मकान खुमार देहलवी मंडावली, पूर्वी दिल्ली में एक बेहतरीन काव्य सत्र का आयोजन 6 दिसंबर, 2025 को किया गया। इस काव्य सत्र के आयोजक और मेजबान उस्ताद शाइर जनाब खुमार देहलवी रहे।


काव्य गोष्ठी की अध्यक्षता उस्ताद शाइर जनाब शमीम ज़मीरी सरधन्वी ने की और गोष्ठी का संचालन असलम बेताब ने किया। विश्व प्रसिद्ध मंच संचालक व कवि ऐजाज़ अंसारी और एडमिरल डॉ. खुर्रम शहज़ाद नूर ने विशेष अतिथि के रूप में भाग लेकर कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई!


हाजी मुहम्मद कामिल राज़, नईम बदायूँनी और क़ाज़ी नज्मुल इस्लाम नज्म साहब ने सम्मानित अतिथि के रूप में अपनी उपस्थिति से गोष्ठी की शोभा बढ़ाई! अन्य शायराओं में जावेद अब्बासी, पंडित प्रेम बरेलवी, क़ाज़ी नज्मुल इस्लाम ‘नज्म’, अहतराम सिद्दीक़ी (जाहिल लखनवी), डॉ. लीज़ा ख़ान “सारा”, हुमा ख़ान देहल्वी और अर्शमान अंसारी ने काव्यपाठ किया।
काव्य गोष्ठी में शाइर-शायराओं द्वारा पढ़ी गयी ग़ज़लों में से एक-एक शेअ्र पेश है :-

ऐ शमीम सरधन्वी और कुछ नहीं देखा
दर्द-ओ-ग़म ही पाया इक आपके फ़साने में
– शमीम ज़मीरी सरधन्वी

रहबरों के अमल में कुछ भी नहीं
जो भी नाअ्रा है इश्तिहार में है
– ऐजाज़ अंसारी

मेरी इज़्ज़त का पास रखने को
भूखे बच्चों ने ख़ुदकुशी कर ली
– ख़ुमार देहल्वी

तमाम उम्र यही सोचता रहा हूँ “नईम”
न जाने कब वो मुझे नाम से पुकारेगा
– नईम बदायूनी

झूठ के इस दौर में,फिर सच की क़ुर्बानी हुई,
हम को साज़िश लग रही है जानी-पहचानी हुई।
– एडमिरल डाॅ. ख़ुर्रम शहज़ाद ‘नूर’

सितम, जोर-ओ-जफ़ा और ज़ुल्म कर लो जितना जी चाहे
तकब्बुर माल-ओ-ज़र का है नशे में चूर हो जिस के
मगर ये याद रखना आह की मज़लूम ने जिस दम
ज़मीं और आस्माँ के दर्मियाँ रह जाओगे पिस के
– हाजी मुहम्मद कामिल राज़ देहलवी

गुज़रे हैं जो साथ तुम्हारे
कागज़ पर वो पल लिखखेंगें
असलम बेताब

लोग कहते हैं जिसको दर्दे-दिल
आशिक़ों की वही कमाई है
– जावेद अब्बासी

अब अपनी मर्ज़ी के मालिक हैं बच्चे
अब तो बच्चों को समझाना मुश्किल है
– पंडित प्रेम बरेलवी

हर तरफ़ हुस्न की तनवीर नज़र आने लगी
मैंने जब ज़ेह्न में उस शौख़ का नक़्शा खेंचा
– क़ाज़ी नज्मुल इस्लाम नज्म

ताक़तवर कहाँ कमज़ोर की मुश्किल समझता है
जो जाहिल है वो दूसरों को भी जाहिल समझता है
अहतराम सिद्दीक़ी (जाहिल लखनवी)

तहरीर ए ज़िन्दगी में,नुक़्ते बहुत हैं
दर्द जो दिखते नहीं ,दुखते बहुत हैं
– डॉ. लीज़ा ख़ान ‘सारा’

ये मुहब्बत भी क्या मुसीबत है
लम्हा-लम्हा अजब अज़िय्यत है
– हुमा ख़ान देहलवी

मस्जिद से स्कूल तलक
चर्चे मेरे नाम के हैं
– अर्शमान अंसारी

अहल-ए-ज़बान की यह महफ़िल दोपहर 2:00 बजे से शुरू होकर शाम 7:00 बजे तक जारी रही, जिसमें शाइर-शायराओं के साथ-साथ स्रोताओं के रूप में मुहम्मद सरफ़राज़, मूहम्मद शहबाज़, सुल्तान अंसारी, समरीन जहां, शाकरा शहबाज, सना अंजुम अंसारी और आसिम फ़राज़ अंसारी भी पूरे समय उपस्थित रहे और शाइर-शायराओं की हौसला अफजाई करते रहे। कार्यक्रम के अंत में काव्य गोष्ठी के आयोजक और मेज़बान जनाब खुमार देहलवी ने सभी अतिथियों को आने के लिए धन्यवाद दिया।

Related Posts

About The Author