अदबी चौपाल फाउंडेशन दिल्ली के बेनर तले महफ़िल-ए-मुशायरा रहा कामयाब

Published Date: 10-02-2026

ख़ुमार देहलवी

नई दिल्ली। अदबी चौपाल फ़ाउंडेशन दिल्ली के तत्वावधान में जमनापार स्थित 18, नम्बर पार्क ऐन्ड काॅलोनी में एक महफ़िल-ए-मुशायरा का आयोजन किया गया।

मुशायरे की अध्यक्षता माअ्रूफ़ शाइर ऐजाज़ अंसारी ने की और हामिद अली अख़्तर मुख्य अतिथि रहे।

 असलम बेताब ने बहुत अच्छे ढंग से मंच संचालक का दायित्व निभाया।

मुशायरे से पूर्व क़ाज़ी नज्मुल इस्लाम नज्म (मुशाइरा कंवीनर) ने सभी अतिथियों का संक्षिप्त एवं सारगर्भित परिचय कराया तथा चौपाल के संस्थापक एवं अधयक्ष ख़ुमार देहलवी ने सभी अतिथियों का स्वागत किया।

कार्यक्रम का जावेद अब्बासी की नात से हुआ, जिसके बाद संस्था के महासचिव पंडित प्रेम बरेलवी ने अपने मख़सूस अंदाज़ में ग़ज़ल प्रस्तुत की और सुनने वालों क

की ज़बरदस्त दाद वसूल की। इस अवसर पर मुशायरे के अध्यक्ष ऐजाज़ अंसारी ने आज के महफ़िल-ए-मुशाइरा के आयोजन पर आयोजन समिति को बधाई दी।

मुख्य अतिथि हामिद अली अख़्र ने कहा कि अदबी चौपाल फ़ाउंडेशन दिल्ली एवं इसके समस्त सदस्यों की सेवाएँ अविस्मरणीय हैं।

इस मुशायरे में दिल्ली व आसपास के क्षेत्रों के अलावा बरेली एवं गुलावठी उ.प्र. से आए शायरों ने भी भाग लिया।

प्रस्तुत हैं मुशाइरे में पढ़े गये अश्आर :-

लम्हाते-ख़ुशी ज़ीस्त में पाऐ नहीं जाते,

अय्याम बग़ैर उनके गुज़ारे नहीं जाते!

उस्ताद शमीम ज़मीरी सरधनवी

जिन्होंने जान दी थी ए वतन तेरी हिफ़ाज़त में,

महक उनके लहू की आज भी मिट्टी से आती है!

ऐजाज़ अंसारी

हर एक सख़्ती-ए-राह को झेल लूँगा

अगर तुम चलो मेरे शाना-ब-शानी

-हामिद अली अख़्तर

आपका दावा मसीहाई का है,

आप क़त्ले-आम रहने दीजिये

ख़ुमार देहल्वी

ये इंतिज़ार के लम्हे, ये पनघटों के सितम

गराँ हैं मेरी समाअत पे आहटों के सितम

-क़ाज़ी नज्मुल इस्लाम नज्म

आँखों में अश्क, पाँव में ज़ंजीर देख कर

वो ख़ुद भी रो पड़े मेरी तस्वीर देख कर

-नईम बदायूनी

बे सहारों की  ढाल बन जाओ

ज़िन्दगी में मिसाल बन जाओ

              असलम बेताब

नहीं होती कोई दस्तक तो आँखें तिलमिलाती हैं

नहीं आता कोई मेहमाँ तो दस्तरख़्वान जलता है

सय्यद ग़ुफ़रान राशिद

ज़ख़्म देना है तो बेशक दीजिये

साथ हमको दीजिये मरहम अलग

    – रामश्याम हसीन

मुझे मंज़ूर जो करते नहीं थे

उन्हें मंज़ूर होता जा रहा हूँ

  – जावेद अब्बासी

वो,जिसे हमने मसीहा कर दिया

छीन कर मुँह से निवाला ले गया

   – पंडित प्रेम बरेलवी

अच्छा हूं चंद लोग की अच्छी निगाहों में,

हर आदमी के वास्ते अच्छा नही हूं मैं।

अशोक साहिब

एहसान  दुश्मनों पे हमारा है  दोस्तों

हम ने तो दोस्तों को भी मारा है दोस्तों

    –एहतराम सिद्दीकी

काग़ज़ पे जब उकेरी है तस्वीर यार की,

कमरे के सूने-पन का मुक़द्दर बदल गया!

गोल्डी ‘ग़ज़ब’

उसके नाम से सजती और सँवरती हूँ,

छम छम करती पांँव की पायल क्या जाने!

सबा अज़ीज़

माज़ी के देखने में किताबें जो कल गई,

देखा जो ख़त तुम्हारा तो हसरत मचल गई!

गुलबहार सिद्दीक़ी

ये मुहब्बत भी क्या मुसीबत है,

लम्हा-लम्हा अजब अज़िय्यत है!

  – हुमा देहलवी

ख़ुद को ख़ुद की नज़र से बचाना जो है,

इसलिये ‘रोज़ी’ काजल लगाती हूँ मैं

  – रोज़ी ख़ान

इनके साथ-साथ बहुत सारे श्रोताओं ने भी मुशाइरे में भाग लिया। अंत में साहिब-ए-ख़ाना क़ाज़ी नज्मुल इस्लाम नज़म ने सभी अतिथियों, शाइरों और शाइरात का तहे-दिल से आभार व्यक्त किया।

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